"Ashfaq Ullah Khan-The Hero of Kakori" A Monologue by Rafi Khan


अशफ़ाक उल्ला खां - द हीरो ऑफ काकोरी
अशफाक उल्ला खां की ज़िंदगी पर आधारित उर्दू भाषा का ये नाटक लिखने में मुझे लगभग 1 साल का वक्त लगा । ये एक साल का वक्त तब लगा जब उनका सारा डेटा मेरा पास मौजूद था.. बहुत से किताबें उनकी जिंदगी पर लिखी गई है लेकिन लिखा सिर्फ वही गया है जो अशफ़ाक उल्ला खां ने अपनी कलम से लिखा था उसी को कहीं ज़बान बदलकर, कहीं शब्द बदलकर, कहीं अंदाज बदलकर पेश किया जाता रहा है.. बहुत से रिसर्चर से भी मिला या यूं कहूं कि कई रिसर्चर मेरे दोस्त हैं जो शहीदों और क्रांतिकारियों पर शोध कर रहे हैं, कोई phd कर रहा है तो कोई अपने स्तर के गुमनाम क्रांतिकारियों को ढूंढने का काम कर रहा है.. ख़ैर ! उन्हीं में से एक मेरे दोस्त है डॉ शाह अलम राणा जब पहले उनसे कहा की हम दोनों मिलकर इस नाटक को लिखते है तो उन्होंने कहा कि खान साहब आप अकेले लिखिए आप लिख सकते हैं क्योंकि आप रंगमंच से जुड़े हुए है.. शुरुआत में डेटा पास में था कई किताबें पढ़ी जो अशफाक उल्ला खां पर आधारित थीं और उनकी डायरी और उनके द्वारा लिखे ख़त भी पढ़े.. यहां एक बात बता देना बहुत ज़रूरी है कि एक मरतबा अशफ़ाक भाई ( शहीद ए वतन अशफ़ाक उल्ला खां के पौत्र जो उनके हमनाम हैं) ने मुझसे कहा था कि "अशफ़ाक उल्ला खां की ज़िंदगी पर कुछ ऐसा बने जो उनके बचपन से लेकर जवानी तक और उनके आख़िरी सफ़र तक सब कुछ समेटे हुए हो" ये बात सुनकर मैं चुपचाप चल आया और इस बारे में कुछ भी नहीं सोचा की मुझे नाटक लिखना है या कोई शॉर्ट फिल्म बनानी है.. कुछ भी नहीं ! क्योंकि मैं और शाह आलम बहुत पहले से अशफ़ाक उल्ला खां की ज़िंदगी पर एक फिल्म या वेब सीरीज बनाने की जद्दोजहद कर रहे हैं जिसके मुत्तालिक शाह आलम की लगभग 20 साल की रिसर्च है, खैर इस बारे में फिर कभी लंबी बात होगी और शायद इसी वजह से शाह आलम ने नाटक को साथ में नहीं लिखा होगा क्योंकि वो फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं...
अशफ़ाक उल्ला खां पर एकल नाटक क्यों लिखा..
दरअसल, मैं 2021 में शाहजहांपुर में मैं मोअज्जम बेग द्वारा लिखित एक नाटक कम्बख़त इश्क़ डायरेक्ट कर रहा था, लगभग पूरा नाटक तैयार था ग्रैंड रिहर्सल निकल रही थी, करोना की दूसरी वेव ने ख़तरनाक हमला बोला था जिसमें कई करीबी दोस्त और रिश्तेदार दुनियां को अलविदा कह गए थे.. ये दुख ये संकट ये मुसीबत न झेलने वाली थी.. इससे थोड़ा सा उबरे ही थे कि अपने साथ रंगमंचीय खेला हो गया, नाटक के लीड एक्टर्स में कुछ लोगों ने कोरोना से भी खतरनाक वायरस घुसेड़ दिया.. वायरस ने अपना काम ठीक से किया.. लेकिन अपन वायरस के आगे कहां झुकने वालों में से थे.. जब अपन करोना के सामने नहीं झुके तो कुछ टटपुंजियों के घिनौने रंगमंचीय वायरस के सामने झुकने का सवाल ही नहीं था.. 
बस ! तभी तय किया कि अशफ़ाक उल्ला खां की ज़िंदगी पर एकल नाटक करूंगा और यही से अशफ़ाक उल्ला खां भाई के उस कथन को सच करने में लग गया.. अशफ़ाक भाई और शादाब उल्ला खां भाई से शहीद ए वतन अशफ़ाक उल्ला खां के बारे में जितनी जानकारी मिला सकती थी वो ली.. शादाब भाई ने एक दो किताबें भी दीं.. इसी क्रम में शहर के मशहूर शायर और जर्नलिस्ट रशीद जुगनू भाई ने भी एक महत्वपूर्ण किताब मिट्टी का क़र्ज़ इरफान अंसारी साहब से दिलवाई जो उर्दू में थी क्योंकि मेरी उर्दू पढ़ने में ठीक नहीं है तो इसमें मदद के लिए सामने आए मशहूर शायर मरहूम डॉ सागर वारसी साहब के साहबजादे परवेज़ अहमद ख़ां उर्फ अच्छे, इन्होंने इस किताब का ट्रांसलेशन करना शुरू किया ही था कि एक दो दिन के बाद ये मेरे घर आए और मिट्टी का क़र्ज़ का हिंदी वर्जन मुझे देते हुए कहा कि ये किताब मेरे घर में ही मुझे अचानक मिल गई.. मुझे अहसास हुआ कि अगर कोई अच्छा काम ईमानदारी के साथ करने निकलो को ख़ुदा हर तरह से मदद करता है..
नाटक लिखना शुरू किया..
जब नाटक लिखना शुरू किया तो जितनी भी किताबें पढ़ सकता था वो पढ़ीं जिनमें यादगारे अशफ़ाक, अशफ़ाक उल्ला खां और उनका युग, मिट्टी का क़र्ज़ आदि  इसके अलावा बहुत कुछ पढ़ा.. लेकिन आख़िर में ये तय किया कि सब किताबें, सारे आर्टिकल ज़्यादातर अशफ़ाक उल्ला खां की डायरी और पत्रों पर ही आधारित है, कहीं कुछ लोगों ने अपना नज़रिया भी रखा है लेकिन इतिहास को बदला नहीं जा सकता जो बाते शहीद ए वतन अशफ़ाक उल्ला खां ने अपनी क़लम से लिख दीं वो अमर हो गईं अब उनको कोई अपना कहकर अपने नाम से छपवा ले तो ये बेइमानी होगी.. इसीलिए मैंने ये तय किया कि नाटक को अशफ़ाक उल्ला खां की डायरी और उनके खतों पर बेस्ड लिखूंगा.. कुछ जगहों पर मैने यादगारे अशफ़ाक और मिट्टी का क़र्ज़  से कुछ अंशों में मदद ली है, क्योंकि ये उर्दू ज़बान में है... जब नाटक को अपने शब्दों में लिखना शुरू किया और जब जब अशफ़ाक उल्ला खां की क़लम से निकली हुई बाते सामने आतीं तो कई कई हफ्तों उनको अपने शब्दों में बदलने की कोशिश करता रहता, लेकिन बिल्कुल भी मज़ा नहीं आता मुझको, भले ही वो मैंने बहुत मेहनत से बहुत अच्छे शब्दों में ढालने की कोशिश की हो लेकिन शहीद ए वतन अशफ़ाक उल्ला खां के अल्फ़ाज़ हमेशा बयां करते की जो लिख दिया है वो पत्थर की लकीर है.. और इसलिए मैं बेझिझक कहूंगा कि कुछ जगहों पर उनके अल्फ़ाज़ जस के तस रखे है क्योंकि उन्होंने जो उस वक्त लिखा होगा वो उस वक्त का उनका सारा दर्द समेटे हुए है, अशफ़ाक उल्ला खां एक बेहद काबिल और अकलमंद शख्सियत थे, उर्दू, फारसी पर उनकी बचपन से गहरी पकड़ थी और अंग्रेजी में भी कोई उनका सानी नहीं, उनकी हैंडराइटिंग ही ये बयान करती है कि उनको अंग्रेजी भाषा का गहरा ज्ञान था वरना वो उस दौर में थॉमस बैबिंगटन मैकाले की उस कविता को जो हॉरिशस पर थी उसको न समझ रहे होते.. जो उनके क्रांतिकारी बनने में भी सहायक बनी.. 
मैं नाटक लिखना शुरू कर चुका था और एक ऐसी जगह पर आकर अटक गया कि एक पठान और एक क्रांतिकारी, रूहानियत की तरफ कैसे रूजू हो गया.. ऐसा क्या हुआ था और कब हुआ था.. ऐसी कौन सी बात थी जिसने अशफ़ाक उल्ला खां को रूहानियत से रूबरू करवाया और एक क्रांतिकारी जब रूहानियत में दाख़िल होता है तक वो कैसे सोचता है, क्या सोचता है.. कैसे उठता बैठता है.. क्या करता है और क्या नहीं करता है.. अशफ़ाक उल्ला खां के अंदर ये बदलाव फैजाबाद जेल में आए थे.. इन सब सवालों का जवाब मैने अपने इस नाटक में दिया है.. नाटक को लिखा मैंने है और निर्देशित भी मैने किया है और पूरी परिकल्पना भी मेरी ही है.. और अभिनय भी मेरा ही है... क्योंकि ये नाटक मैने अपने उस आइडल के लिए लिखा है जो मुझे ही नहीं दुनियां को ये चीख चीख कर बताता है कि जो आज़ादी तुमको मिली है वो कितनी कुर्बानियां देकर मिली है, जिसका तुम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते.. ये नाटक मैने अपने उस आइडल के लिए लिखा है जो हिन्दू मुस्लिम एकता और मोहब्बत की मिसाल है...
और आख़िर में यहीं कहूंगा कि मैं कह तो ये रहा हूं कि नाटक मैंने लिखा है लेकिन सच्चाई ये है कि ये नाटक शहीद ए वतन अशफ़ाक उल्ला खां ने लिखवाया है...
इस नाटक के बारे में और बहुत सी रोचक जानकारी अगले लेख में...

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